परोपकार पर निबंध | Paropkar Par Nibandh (November 2021)

paropkar par nibandh

दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपके लिए लेकर आए है paropkar par nibandh जो की बहुत ही सरल भाषा में लिखे हैं। किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन में परोपकारी बनना चाहिए। यह एक ऐसी भावना है जो शायद कोई सिखा नहीं सकता, यह किसी के भीतर खुद आती है। इस पोस्ट में हमने बेहतरीन व सबसे नए परोपकार पर निबंध का कलेक्शन तैयार किया है। आप हमारे इन निबंधो को स्कूल या कॉलेज में निबंध प्रतियोगिता में लिख सकतें है। और सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते हैं।


परोपकार पर निबंध – Paropkar Par Nibandh


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प्रस्तावना

संसार के हर धर्म में परोपकार की महिमा गाई गयी हैं। महामुनि व्यास कहते हैं , “परोपकार पुण्याय पापाय पर पीडनम्”
महाकवि तुलसीदास भी कहते हैं . ” परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई ” परोपकार ही सबसे बड़ा पुण्य है, और पर पीड़न ही सबसे बड़ा पाप हैं।

परोपकार का अर्थ:

मूल शब्द परोपकार दो शब्द पर और उपकार के संयोग से बनता हैं, जिसका आशय यह हैं कि बिना किसी लोभ या लालच के दूसरों की भलाई करना उनकी मदद करना परोपकार कहा जाता हैं। “पर” अर्थात दूसरों का उपकार ही परोपकार है।

मनुष्य को पशु स्तर से उठाकर मानवीयता के महिमामय स्वरूप से मंडित करने वाला परोपकार ही हैं, यश प्राप्ति या प्रसिद्धि के लिए भी लोग दूसरों की सहायता किया करते हैं। किन्तु कोई भी कार्य तब तक उपकार की श्रेणी में नहीं आ सकता, जब तक कि निस्वार्थ भाव से न किया गया हो | परोपकार के मूल में त्याग है और त्याग के लिए साहस आवश्यक हैं। अतः साहस के साथ स्वयं कष्ट सहते हुए भी दूसरों की भलाई में रत रहना ही परोपकार हैं।

परोपकार एक दैवी गुण:

परोपकार एक का असाधारण गुण है जो विरले ही व्यक्तियों में देखा जाता हैं। हर व्यक्ति के लिए इस व्रत को धारण कर पाना संभव भी नहीं हैं।
एक महात्मा बार बार नदी में बहते बिच्छू को बचाने के लिए उठाते है और वह मुर्ख हर बार उनको डंक मार नदी में जा गिरता है, लेकिन परोपकारी संत असहय पीड़ा सहन करके भी उसे बचाते हैं। ऐसे परोपकारी संत देवताओं के तुल्य हैं।

स्वारथ सूका लाकड़ा, छांह बिहना सूल।
पीपल परमारथ भजो, सुख सागर को मूल।।
-कबीर

परोपकारी महापुरुष:

भारत को परोपकारी महात्माओं की दीर्घ परम्परा ने गौरवान्वित किया हैं। शिवी राजा का उदाहरण भी कम उज्ज्वल नहीं, जिन्होंने एक पक्षी की रक्षार्थ अपना माँस ही नहीं, शरीर तक दान में दे दिया। परोपकारियों को इसकी चिंता नहीं होती कि संसार उनके विषय में क्या कह रहा है या कर रहा हैं। उनका स्वभाव ही परोपकारी होता है।

तुलसी संत सुअब तरु, फूल फलहिं पर हेत, इतते ये पाहन हनत उतते वे फल देत

परोपकार का महत्व:

आज के घोर भौतिकवादी युग में तो परोपकार का महत्व और भी बढ़ गया हैं। विकसित और विकासशील देशों की कटु स्पर्धा को रोकने और संसार में आर्थिक संतुलन तथा सुख सम्रद्धि लाने के लिए राष्ट्रों को चाहिए कि वे परोपकार की भावना से काम लें परन्तु उस उपकार के पीछे राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि एवं प्रभाव विस्तार की भावना नहीं होनी चाहिए।

परोपकार पर कविता

जब भी हम किसी किताब को खोलते हैं और पढ़ते हैं,
तो एक वृक्ष मुसकुराकर संदेश देता है,
कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है,
भले ही संदेश का यह संकेत हम न समझ पाते हों,
पर यह तो सच है,
कि वृक्ष का जीना भी परोपकार के लिए होता है,
और उसका मरना भी परोपकार के लिए ही होता है,

इस कविता में वृक्ष जो हमेशा परोपकार करता है मनुष्य से लेकर जानवरों, पक्षियों पर, वह हमें छाया देता है। और सर्दी में बचने के लिए लकड़ी, वृक्ष का जीवन एक परोपकार है।

निष्कर्ष

परोपकार धर्मों का धर्म कहलाता हैं। परोपकार धर्म वह अमृत है जो जीव मात्र को संतोष तथा आनन्द की संजीवनी से ओत प्रेत कर देता हैं। परोपकारी व्यक्ति स्वयं स्वार्थ हीन होता हैं, उसका परोपकार ही उसकी अमर निधि बन जाता हैं, हरि अनंत हरि कथा अनंता की भांति परोपकार की कथा भी अनंत हैं, वह द्रोपदी का चीर है जिसका कोई अंत नहीं।


परोपकार पर निबंध हिंदी में – Essay On Paropkar In Hindi


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निबंध की रूपरेखा

  • प्रस्तावना
  • समाज का आधार दर पर हित की भावना
  • परोपकार स्वाभाविक गुण है
  • परोपकार एक महान धर्म है
  • उपसंहार

प्रस्तावना

मानव जीवन भगवान की बनाई एक अमूल्य निधि है। ऐसे महापुरुष कम ही होते हैं जो अपने जीवन के उद्देश्य को समझते हैं। उनको पाने का प्रयास करते हैं और सफल भी होते हैं। मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य है,मानव कल्याण।

“परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।”

जो मनुष्य अपने आत्मिक विकास के साथ मानव जाति का कल्याण करने में जितना सफल हो जाता हैए वह उतना ही महान् बन जाता है। संकुचित स्वार्थ से ऊपर उठकर मानव जाति का निःस्वार्थ उपकार करना ही मनुष्य का प्रधान कर्तव्य और सबसे बड़ा धर्म है।

समाज के उत्थान में परोपकार की भूमिका:

समाज की स्थिति परहित की भावना पर आधारित है। मनुष्य मूलतः एक सामाजिक प्राणी है। बिना समाज के मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। जिस समाज के सदस्यों में परस्पर सहयोग की भावना जितनी अधिक होती है वह समाज उतना ही सुखी और सम्पन्न होता हैं | इसीलिए विश्व की सभी प्राचीन एवं आधुनिक सभ्यताओं में परोपकार की भावना पायी जाती है। सभी धर्मों में परोपकार की भावना को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। श्वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

परोपकार स्वाभाविक गुण है:

हिन्दू संस्कृति में तो परोपकार को सबसे बड़ा धर्म माना गया है।

परोपकार की भावना मानव के लिए स्वाभाविक है। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों और जड़ पदार्थों में भी यह भावना पायी जाती है। जो व्यक्ति सज्जन और विवेकशील हैं, वे सदा इस भावना का आदर करते हैं। वे स्वयं अनेक कष्ट सहकर भी दूसरों का उपकार करते हैं। हम देखते हैं, कि जड़ वृक्ष दूसरों के खाने के लिए ही फल उत्पन्न करते हैं। तथा उनका बोझ धारण करते है।

जिस प्रकार नदी दूसरों के हित के लिए ही जल को बहाती है। जिस प्रकार पेड़ अपनी छाया खुद के लिए नही लेता अपने फल खुद नही ख़ाता, तब विवेकशील मानव क्यों न परोपकार के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दे, इसी भाव को कविवर कबीर ने इस प्रकार से प्रकट किया है।

वृक्ष कवहँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।
परमारथ, के कारने, साधुन धरा शरीर॥

जो मनुष्य इस परोपकार रूपी मानवीय धर्म का पालन नहीं करता, जो परहित के लिए अपना तन-मन-धन, सब कुछ अर्पित नहीं कर देता, वह मनुष्य नहीं,मानवता के लिए अभिशाप है। महापुरुष अपना सर्वस्व देकर भी दूसरों का उपकार करते हैं।
दानवीर कर्ण ने अपने अमूल्य कवच और कुण्डल परोपकार के लिए दे दिये थे। महर्षि दधीचि ने देवों के उद्धार के लिए अपनी हड्डियाँ दे दी थी, और महात्मा गांधी ने परोपकार के लिए ही अपने प्राण दे दिये थे। इस प्रकार के परोपकारी मनुष्य संसार मे अमर हो जाते हैं।

परहित सरिस धर्म नहिं भाई:

वास्तव में समाज उन महापुरुषों के बल पर खड़ा है, जिन्होंने परहित और मानव कल्याण को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया है। निरूस्वार्थ भाव से चिन्तन करने वाले महात्माओं द्वारा ही समाज का कल्याण होता है। यही वह धर्म है जिसके द्वारा मानव जाति का उद्भार हो सकता हैए विश्व-शान्ति की स्थापना का स्वप्न पूरा हो सकता है।

मरु पर मांगू नहीं, अपने तन के काज ।
परमारथ के कारने, मोहि न आबे लाज।।

कवि कबीर दास जी द्वारा रचित है, जहां वह कह रहे हैं व्यक्ति को अपने लिए कभी याचना नहीं करनी चाहिए। किंतु यदि बात दूसरों के हित की हो तो व्यक्ति को सौ बार भी हाथ फैलाने पड़ जाए, तब भी वह पुण्य का भागी बनता है। इसी संदेश को प्रतिपादित करते हुए कबीरदास जी कहते हैं, कि मैं मरना पसंद करूंगा, किंतु अपने शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी से भी कुछ नहीं मांगूंगा।

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परोपकार का महत्व पर निबंध – Paropkar Ka Mahatva


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प्रस्तावना

परोपकार दो शब्दों पर+ उपकार के मेल से बना है, जिसका अर्थ है “दूसरों का हित “ अपने व्यक्तिगत हित की परवाह किए बिना दूसरों की भलाई के लिए कार्य करना ही परोपकार है। परोपकार के लिए त्याग की भावना का होना बहुत आवश्यक है।

परहित सरस धर्म नहि भाई।
पर पीडा सम नहिं अधमाई।”

अर्थात् दूसरों का उपकार करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है तथा दूसरों को पीड़ा देने से बढ़कर कोई पाप नहीं है।

प्रकृति तथा परोपकार

ये सूरजए ये चाँद, ये तारे,
ये धरती, ये नदिया, ये पवन।
परोपकार की जिंदा मिसाल हैं,
ये खेत, ये पेड़, ये वन-उपवन।
नदियाँ पानी स्वयं नही पीतीं,
पेड़ अपने फल स्वयं न खाता।
सूरज खुद को प्रकाश न देता,
चाँद खुद के लिये शीतलता न लाता।
ये सब परोपकार कर रहे,
इस धरती के मानव पर।
नही करते ये भेद कभी भी,
धरती हो या हो अंबर।

परोपकार की सच्ची शिक्षा हमें प्रकृति से ही मिलती है। प्रकृति तो केवल परोपकार ही करना जानती है। ठीक इसी प्रकार महापुरुषों का पूरा जीवन परोपकार करने में ही व्यतीत हो जाता है।

परोपकार कैसे किया जाए

प्रकृति की ही तरह हम सब भी परोपकार कर सकते हैं। भूखे को रोटी खिलाकर प्यासे को पानी पिलाकर, किसी बुजुर्ग को सड़क पार कराकर, किसे भूले भटके को सही राह दिखाकर, किसी रोगी को अस्पताल पहुँचाकर, कुंए खुदवाकर, अशिक्षितों को शिक्षा देकर, बच्चों को खिलोने देकर, अबलाओं तथा पीड़िताओं की सहायता करके हम परोपकार ही कर रहे होते हैं। यदि हमारे पास धन की बहुतायत है तो निर्धनों तथा जरुरतमंदों में धन बाँटकर और यदि धन की कमी है तो अपने तन और मन से उनकी सहायता करके परोपकार कर सकते हैं।

परोपकार के उदाहरण:

हमारे इतिहास में परोपकारी व्यक्तियों के अनेक उदाहरण हैं। महर्षि दधीचि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों को भी दान में दे दिया था। राजा शिवि ने एक घायल कबूतर के प्राणों की रक्षा के लिए भूखे बाज को अपने शरीर का माँस काटकर दे दिया था। महान दानवीर कर्ण ने खुशी-खुशी अपने कवच और कुंडल सुरपति को दान कर दिए।

परोपकार की महिमा अवर्णनीय है। अपने परोपकारी कार्यों के द्वारा ही मानव समाज तथा राष्ट्र दोनों ऊपर उठ सकता है। दानवीर कर्ण, महावीर ,गौतम, रामचन्द्रजी, महात्मा गाँधी, दयानन्द सरस्वती, गुरुनानक, मदर टेरेसा, विनोवा भावे ऐसे ही व्यक्ति थे | जिन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों की भलाई में लगा दिया था।

निष्कर्ष:

परोपकार करने से हमें आत्मिक तथा मानसिक शान्ति मिलती है। परोपकारी कार्य करने से हमें यश की प्राप्ति तो होती ही है, साथ-साथ हम जन-जन के हदय में श्रद्धा के पात्र बन जाते हैं। हर इंसान की पहचान उसके कायों से ही होती है। अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन सच्चा जीवन तो वही जीत है जो दूसरों के काम आता है।समय तथा पात्र को ध्यान में रखकर किया गया परोपकार सबसे बड़ी सम्पत्ति है।

जिस प्रकार मेंहदी बाँटने वाले व्यक्ति के स्वयं के हाथ भी लाल हो जाते, उसी प्रकार दूसरों का परोपकार करते-करते इंसान अपना भी परोपकार कर लेता है, अतः प्रत्येक व्यक्ति को परोपकारी कार्य कर्तव्य समझकर पूरी निष्ठा अपना से करने चाहिए। किसी निजी स्वार्थ के वशीभूत होकर किया गया परोपकार किसी काम का नहीं होता है।


परोपकार पर निबंध इन हिंदी – Paropkar Par Nibandh In Hindi


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Paropkar Nibandh

प्रस्तावना

शास्त्रों में परोपकार को साधना का एक जरूरी अंग कहा गया है और हर साधना के साथ परोपकार का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि जिसके अंदर परोपकार की भावना नहीं है वह ज्यादा प्रगति नहीं कर सकता।

प्रकृति के नियम के अनुसार जो जैसा करता है, उसे वैसा फल प्राप्त होता है। इंसान द्वारा किए गए कर्मों के परिणाम उसे अवश्य ही भुगतने पड़ते हैं चाहे वह छल हो या परोपकार।

परोपकार की परिभाषा :

परोपकार शब्द संस्कृत के ‘पर और उपकार’ शब्द से मिलकर बना हुआ है। पर अर्थात दूसरों पर उपकार अर्थात उपकार या मदद। जब किसी के ऊपर बिना स्वार्थ के कोई उपकार किया जाता है तो उसे परोपकार कहा जाता है। लेकिन जिस उपकार में निजी स्वार्थ निहित हो उसे परोपकार नहीं कहा जा सकता।

उदाहरण के तौर पर अगर हम किसी गरीब को बिना किसी स्वार्थ के भोजन देते हैं तो वह परोपकार की श्रेणी में गिना जाएगा। आज के समय बहुत सी ऐसी संस्थाएं हैं जो बिना किसी स्वार्थ के लोगों की सेवा कर रहे हैं।

परोपकार का महत्व :

महान कवि रहीम के दोहों से परोपकार का महत्व भली-भांति जाहिर होता है। कवि रहीम आजीवन परोपकार के अप्रतिम उदाहरण रहे।

कवि रहीम कहते हैं
तरुवर फल नहिं खात है
सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित,
संपति सँचहि सुजान।

अर्थात पेड़ कभी भी अपना फल स्वयं नहीं खाता वह परोपकार के रूप में उसे अन्य सजीवों को समर्पित कर देता है। ठीक है ऐसे ही कोई भी नदी अपने जल को स्वयं ग्रहण नहीं करती है, उसे जनजीवन को पूर्णत: समर्पित कर देती है। कवि रहीम कहते हैं, कि इनकी तरह जो इंसान परोपकार के काम करता है। वह उसकी सच्ची संपत्ति मानी जाती है।

सनातन संस्कृति के सार के रूप में परोपकार को लिया जा सकता है इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया।प्राचीन काल में गुरुकुल के माध्यम से परोपकार को धर्म के एक विशेष पहलू के रूप में पढ़ाया जाता था। जिसके माध्यम से बालकों में शुरुआत से ही परोपकार की भावना जागृत रहती थी।

हमारे घर के पुराने लोगों के माध्यम से ऐसी कहानियां व भजन सुनने को मिलता था जिसमें परोपकार को एक विशेष गुण तथा सबसे जरूरी कर्म के रूप में अति आवश्यक कर्म बताया जाता था।आज ज्यादातर इंसानों के अंदर से संवेदनशीलता तथा परोपकार समाप्त हो चुकी है। आए दिन ऐसी खबरें देखने को मिलती है जहां परोपकार तो दूर इंसानियत भी देखने को नहीं मिलती।

परोपकार ही जीवन का सार :

सनातन संस्कृति में परोपकार को ही जीवन का सार कहा गया है। हर पूजा पद्धति तथा ज्ञान हमें परोपकार को जीवन में नियमित रूप से अपनाने का आदेश देता है।हर धर्म में परोपकार को सबसे ऊंचा दर्जा प्राप्त है इतिहास में जितने भी महामानव हुए हैं, उनके अंदर एक गुण सामान्य रहे हैं, वह परोपकार की भावना।

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं, कि जिस मनुष्य का परोपकार करना है, वह जरा भी नहीं हिचकता। वह परोपकार करते हुए यारी दोस्ती का विचार नहीं करते। राजा शिवि ने प्रसन्न मुद्रा में अपने शरीर का मांस काट कर दिया, तो महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान में दीं।


परोपकार पर निबंध लेखन – Paropkar Par Anuched


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Paropkar Quotes In Hindi

दुनिया में अपने स्वार्थ के लिए तो कोई भी काम करते है, लेकिन जो अपने स्वार्थ को भूलकर दूसरों के लिए काम करे वो परोपकारी होता है। परोपकार करना मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म होना चाहिए क्योंकि पूरे संसार में ईश्वर ने केवल मनुष्य को ही सबसे गुणवान और शक्तिशाली बनाया है।

प्रस्तावना:

परोपकार शब्द ‘पर’+‘उपकार’ दो शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है “दूसरों की भलाई करना” या उनकी भलाई के काम में अपना निस्वार्थ योगदान देना है।इंसान गरीब हो या अमीर हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, किसी भी प्रकार से वो परोपकार कर सकता है।
परोपकार का सबसे बड़ा पाठ तो हमारी प्रकृति हमें सिखाती है वो निस्वार्थ मनुष्य और जीव-जंतुओं की हर जरुरत को पूरा करती है। प्रकृति हमें मुफ्त में हवा, पानी, फल, फूल, वनस्पति सब कुछ उपलब्ध कराती है।

तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

रहीम कहते हैं कि परोपकारी लोग परहित के लिए ही संपत्ति को संचित करते हैं। जैसे वृक्ष फलों का भक्षण नहीं करते हैं और ना ही सरोवर जल पीते हैं, बल्कि इनकी सृजित संपत्ति दूसरों के काम ही आती है। इसी प्रकार कुछ लोग ऐसे होते है जिनको दूसरे असहाय और गरीब लोगों या जानवरों की आर्थिक और सामाजिक रूप से मदद करने में ख़ुशी का अनुभव होता है।

परोपकार का महत्त्व:

भारतीय समाज में प्राचीन काल से लोगों को परोपकार करने का ज्ञान दिया जाता हैण् हमारे परिवार में भी जब हम छोटे थे तब हमारे माता पिता और शिक्षक यही ज्ञान देते आ रहे है कि हमें हमेशा बिना किसी स्वार्थ के जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए। ऐसे लोगों को एक वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए कोई रोटीए कपड़ा और रहने के लिए छत की व्यवस्था करे इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।

परोपकारी व्यक्ति कभी जगह और धन नहीं देखता उसका मकसद किसी न किसी प्रकार से जीवों की मदद करना होता है | परोपकारर का यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि अगर आपके आस पास कोई बीमार और लाचार है | लेकिन आप उसकी मदद नहीं कर रहे हो और केवल दिखावे के लिए बड़ी संस्थाओं में दान कर रहे हो।

परोपकार के लिए व्यक्ति का हृदय और मन दोनों ही निस्वार्थ होने चाहिए, इंसान को वास्तविकता में अंदर से खुशी का अनुभव तभी होगा जब वो किसी गरीब और असहाय की मदद करेगा, गरीब लोगों की दुआ में बहुत ताकत होती है | परोपकार लोगों की वजह से रंग, जाति, धर्म, गरीबी हर प्रकार के भेदभाव के प्रति लोगो की सोच बदल रही है।

धार्मिक रूप से परोपकार:

राजा भर्तृहरि ने नीतिशतक में लिखा है, सूर्य कमल को स्वयं खिलाता है। चंद्रमा कुमुदिनी को स्वयं विकसित करता है। बादल स्वयं बिना किसी के कहे, जल देता है। महान आत्माएं यानी श्रेष्ठ जन अपने आप दूसरों की भलाई करते हैं। इसका आशय यह है कि प्रकृति का हर तत्व दूसरों की भलाई बिना किसी के कहे करता है।

यही वजह है कि हमें भौतिक जगत का प्रत्येक पदार्थ मनुष्य के उपकार में लीन दिखता है। सूर्य, चंद्रमा, तारे, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, औषधियां, वनस्पतियां, फल, फूल और पालतू पशु दिन-रात मनुष्य के कल्याण में लगे हुए हैं। ये सभी दूसरों के उपकार के लिए कुछ न कुछ देते हैं। यदि ये परोपकार में लगे हैं तो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के प्रति उपकार क्यों नहीं करना चाहिए।


प्रकृति का यह एक महान संदेश है। जैसे सूर्य अपना प्रकाश स्वयं ही सब को समान रूप से देता हैए हमारे जीवन का उद्देश्य भी ऐसा ही होना है। जैसे बादल हमें जल देते हैं और किसी से यह नहीं पूछते कि “तुम सुपात्र हो या नहीं” वैसे ही हमारा जीवन भी दूसरों को देने के लिए है।

वेदों में कहा गया है कि मनुष्यों को ऐसा पवित्र और शुद्ध जीवन जीना चाहिए जिससे संसार में भ्रातृ भावना और मानव समाज के प्रति उपकार की भावनाए दानशीलता और सृजनता की भावना पैदा हो। दूसरों के लिए जीया गया जीवन ही उचित जीवन है। इसलिए जो कुछ हमारे पास है, उसमें से कुछ परोपकार में अवश्य लगाएं चाणक्य ने कहा था, परोपकार ही जीवन है।

जिस शरीर से धर्म नहीं हुआ, यज्ञ न हुआ और परोपकार न हो सका, उस शरीर का क्या लाभ, सेवा या परोपकार की भावना, चाहे देश के प्रति हो या किसी व्यक्ति के प्रति वह मानवता है। परोपकार से ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग खुलता है। धार्मिक रूप से परोपकार में लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है जो समाज के लिए एक सकारात्मक सन्देश है।

सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है परोपकार:

व्यक्ति जितना परोपकारी बनता है, उतना ही ईश्वर की समीपता प्राप्त करता है। परोपकार से मनुष्य जीवन की शोभा प्राप्त करता है। परोपकार से मनुष्य जीवन की शोभा और महिमा बढ़ती है। सच्चा परोपकारी सदा प्रसन्न रहता है। वह दूसरे का कार्य करके हर्ष की अनुभूति करता है। परोपकार की प्रवृत्ति को अपना कर हम एक प्रकार से ईश्वर की रची सृष्टि की सेवा करते है। ऐसा करने से हमें जो आत्मसंतोष और तृप्ति मिलती है, उससे हमारी सारी संपत्तियों की सार्थकता साबित होती है।

परोपकार की एक आध्यात्मिक उपयोगिता भी है। वह यह है कि हम दूसरों की आत्मा को सुख पहुंचा कर अपनी ही आत्मा को सुखी बनाते हैं। जब हम परोपकार को अपना स्वभाव बना लेते है तो उसका दोहरा लाभ होता है। परोपकार की नीति के तहत किसी की सहायता करके और दूसरों के प्रति सहानुभूति दर्शा कर जिन दीनहीनों का कष्ट दूर किया जाएगाए उनमें सद्भावपूर्ण मानवीय चेतना जाग्रत होगी। ऐसा होने से वे भी दूसरों की सेवा और सहयोग करने का महत्व समझने लगते हैं।

निष्कर्ष:

परोपकार दुनिया का सबसे महान कार्य कहा जा सकता है और यह हर व्यक्ति के बस की बात नहीं है। परोपकार करने के लिए व्यक्ति के अंदर धैर्य और दान की भावना होनी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति सक्षम है तो उसको निश्चित रूप से परोपकार की ओर ध्यान देना चाहिए, आप भी किसी न किसी प्रकार से परोपकार के भागी बन सकते है।

(Source : Suvichar Kosh)

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